थोड़ी सी ख़ीज थी शायद जो कहीँ रह गयी थी। बुद्धत्व में जो आड़े आ रही थी। आज वो भी निकल गयी । न न न गाली गलौच नहीं बस थोड़ा सा ग़ुस्सा। कुछ कटु सत्य कुछ और पिछले एक साल से दिल में बैठी जकड़न । पूरा तो नहीं पर हां थोड़ा तो मन हल्का हुआ है। बड़ा अज़ीब है ना ये गुस्सा भी, जब आता है तो कुछ नहीँ सूझता और जब गुजर जाता है तो रात भर के लिए विचारो में हलचल छोड़ जाता है।
वैकल्पिक समाधान खोजने पूर्व या किसी मध्यस्ता से पहले मेरे हिसाब से जो ये आर पार वाली पुरानी पद्धति एक बार तो आजमा लेनी चाहिए। ये कोई ठोस परिणाम तो नही देगी पर compromise वाली स्थिति से ऊपर ला खड़ा करेगी।
जो ये शब्द है ना 'अहंकार' बड़ा अधूरा है ये फलीफ़ूत दुसरो के कांधो पर ही होता है । अहम् ही अहम् का जन्मदाता है।
ये सब बातें इसलिए की कहीँ कुछ उलझन है जो चुभ रही थी कई महीनो से। इसके निपटारे में सुकून जरूर है पर शांति नही है। एक स्वेत द्वेष सतत चलता रहेगा। और फिर ये अपनी जड़े पसरेगा।
ये द्वेष ही जो विकास और पतन दोनों का कारण है।
Monday, 24 August 2015
द्वेष
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