Monday, 24 August 2015

द्वेष

थोड़ी सी ख़ीज थी शायद जो कहीँ रह गयी थी। बुद्धत्व में जो आड़े आ रही थी। आज वो भी निकल गयी । न न न गाली गलौच नहीं बस थोड़ा सा ग़ुस्सा। कुछ कटु सत्य कुछ और पिछले एक साल से दिल में बैठी जकड़न । पूरा तो नहीं पर हां थोड़ा तो मन हल्का हुआ है। बड़ा अज़ीब है ना ये गुस्सा भी, जब आता है तो कुछ नहीँ सूझता और जब गुजर जाता है तो रात भर के लिए विचारो में हलचल छोड़ जाता है।
वैकल्पिक समाधान खोजने पूर्व या किसी मध्यस्ता से पहले मेरे हिसाब से जो ये आर पार वाली पुरानी पद्धति एक बार तो आजमा लेनी चाहिए। ये कोई ठोस परिणाम तो नही देगी पर compromise वाली स्थिति से ऊपर ला खड़ा करेगी।
जो ये शब्द है ना 'अहंकार' बड़ा अधूरा है  ये फलीफ़ूत दुसरो के कांधो पर ही होता है । अहम् ही अहम् का जन्मदाता है।
ये सब बातें इसलिए की कहीँ कुछ उलझन है जो चुभ रही थी कई महीनो से। इसके निपटारे में सुकून जरूर है पर शांति नही है। एक स्वेत द्वेष सतत चलता रहेगा। और फिर ये अपनी जड़े पसरेगा।
ये द्वेष ही जो विकास और पतन दोनों का कारण है।

समझ

कहीं कुछ तो हे जो मुझे समझ नही आता या फिर मैं समझने के काबिल नही। तू तेरी मौजूदगी की इत्तेला करता रहता हे वक्त बेवक्त । सुनता भी है तू अर्जियाँ मेरी , पर ये समझने नही देता की मेरी कहनी पर तूने ये किया की तेरी रजा ही यही थी। मिलवाया भी तूने मुझे उससे, मेरा कहा तो पूरा हुआ। ख़ुशी तो हुई पर असमंजस में चित्त पड़ गया।अजीब सी उलझन है ये।
कभी तुझ पर यकीन होता है कभी यकीन करने के लिये तर्क काफी नही होते। ग़र तार्किक ही है तू ,तो कोई तो तर्क बैठता तेरी मोजुदगी पर। शायद ये सवाल ही गलत है, तेरे होने का विचार ही मुझसे है और मैं तेरे बगैर कैसे?
खैर जो भी हो ,क्या प्रयोजन था उस मुलाक़ात का ये तो प्रश्न ही रहेगा।
सारे जो बने बनाये विचारो के स्तम्भ है उन्हें तू जिस बर्बरता से तोड़ता है वो इशारा तो है तेरे मैं होने का।

Thursday, 24 October 2013

दलीलें

 किस तरह शब्दों की लयबद्धता तोड़कर, वाक्यों में पिरोऊ , अल्पविराम और पूर्णविराम का साथ केसे निभा पाऊंगा। यह सवाल कई बार तुकबन्दी और कविताओं से बाहर नहीं आने देता था मुझे। फिर जैसे की जो होगा देखा जाएगा वाली भावना का हाथ पकड़कर आज ये फीता काटा है। समझाने में वह मजा नही रह जाता जो समझने में आता है। यह ठीक उसी तरह से है जैसे कोई joke सुनाने के बाद समझाना पड़े , फिर वो हंसी , वो material  नहीं रह जाता। कुछ ऐसा ही फर्क मुझे हमेशा से कविताओं और लेखों के बीच लगता रहा। वेसे इस सवाल का जवाब सिर्फ तार्किक ही हो सकता है।
जब कहीं प्रेमचंद को पड़ता  हूँ तो मेरे ही शब्द मुझे खाने पड़ते है। तब कही अपनी सोच को छोटा पाता हूँ। लेख और कहानियां कुछ ज्यादा ही कहते हुए लगते है, कहीं समझाने का भाव नहीं लगता।
  वहीँ जब गुलज़ार साब की कोई नज़्म नज़र आती है तब, फिर मेरे तार्किक मन को थोडा support मिलता है। जो चंद लाइनों में पूरी कायनात समेटकर, संसार छुपा होता है, वह और कहाँ  मिलेगा। खैर मध्यस्थता को लेकर अपना पक्ष रखूँगा ,दोनों ही अपनी जगह वजूद और यथार्थ को पिरोये हुए है।