कहीं कुछ तो हे जो मुझे समझ नही आता या फिर मैं समझने के काबिल नही। तू तेरी मौजूदगी की इत्तेला करता रहता हे वक्त बेवक्त । सुनता भी है तू अर्जियाँ मेरी , पर ये समझने नही देता की मेरी कहनी पर तूने ये किया की तेरी रजा ही यही थी। मिलवाया भी तूने मुझे उससे, मेरा कहा तो पूरा हुआ। ख़ुशी तो हुई पर असमंजस में चित्त पड़ गया।अजीब सी उलझन है ये।
कभी तुझ पर यकीन होता है कभी यकीन करने के लिये तर्क काफी नही होते। ग़र तार्किक ही है तू ,तो कोई तो तर्क बैठता तेरी मोजुदगी पर। शायद ये सवाल ही गलत है, तेरे होने का विचार ही मुझसे है और मैं तेरे बगैर कैसे?
खैर जो भी हो ,क्या प्रयोजन था उस मुलाक़ात का ये तो प्रश्न ही रहेगा।
सारे जो बने बनाये विचारो के स्तम्भ है उन्हें तू जिस बर्बरता से तोड़ता है वो इशारा तो है तेरे मैं होने का।
Monday, 24 August 2015
समझ
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