Thursday, 24 October 2013

दलीलें

 किस तरह शब्दों की लयबद्धता तोड़कर, वाक्यों में पिरोऊ , अल्पविराम और पूर्णविराम का साथ केसे निभा पाऊंगा। यह सवाल कई बार तुकबन्दी और कविताओं से बाहर नहीं आने देता था मुझे। फिर जैसे की जो होगा देखा जाएगा वाली भावना का हाथ पकड़कर आज ये फीता काटा है। समझाने में वह मजा नही रह जाता जो समझने में आता है। यह ठीक उसी तरह से है जैसे कोई joke सुनाने के बाद समझाना पड़े , फिर वो हंसी , वो material  नहीं रह जाता। कुछ ऐसा ही फर्क मुझे हमेशा से कविताओं और लेखों के बीच लगता रहा। वेसे इस सवाल का जवाब सिर्फ तार्किक ही हो सकता है।
जब कहीं प्रेमचंद को पड़ता  हूँ तो मेरे ही शब्द मुझे खाने पड़ते है। तब कही अपनी सोच को छोटा पाता हूँ। लेख और कहानियां कुछ ज्यादा ही कहते हुए लगते है, कहीं समझाने का भाव नहीं लगता।
  वहीँ जब गुलज़ार साब की कोई नज़्म नज़र आती है तब, फिर मेरे तार्किक मन को थोडा support मिलता है। जो चंद लाइनों में पूरी कायनात समेटकर, संसार छुपा होता है, वह और कहाँ  मिलेगा। खैर मध्यस्थता को लेकर अपना पक्ष रखूँगा ,दोनों ही अपनी जगह वजूद और यथार्थ को पिरोये हुए है।